दीपशिखा गैस सेवा साहित्य वातायान

संस्कृत साहित्य के इतिहास में महकवि कालिदास को दीपशिखा कालिदास की विशेषणमूलक संज्ञा से समलंकृत किया गया है। महाकवि नें अपने रधुवंश महाकाव्य में राजा दशरथ के पिता अज के विवाह प्रसंग में वर्णन किया है कि अज की भावी पत्नी जब स्वयंबर-सभा में वरमाला लेकर विभिन्न भूपालों की पंक्ति से गुजरती थी तब ऐसा लगता था जैसे रात्रि में दीपशिखा चल रही हो। कालिदास की इस चमत्कारमयी उपमा से प्रभावित होकर लोग उन्हें दीपशिखा कालिदास कहने लगे। यों भी दीपशिखा रात्रि में किसी मार्ग से गुजरती है तो उसके आगे के महल देदीप्यमान हो उठते हैं और पीछे के भवन प्रभाहीन हो जाते हैं। गैस सेवा के प्रति समर्पित दीपशिखा प्रतिष्ठान की भी ठीक यही स्थिति है। गैस सिलिंडर रूप दीपशिखा जिसमें घर में जाती है उस घर की गृहणियों के मुखमंडल हर्षदीप्त हो जाते हैं और जो गृहणियॉ इस दीपशिखा से वंचित रहती हैं उनका मुखमंडल उदास और दीप्तिहीन हो जाता है। इस प्रकार अभिजित काश्यप की घर-घर को प्रकाशित करनेवाली यह दीपशिखा कालिदास की संचारिणी दीपशिखा से क्या कम है।

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव
पूर्व संपादक, परिषद पत्रिका
बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना

 
दीपशिखा महादेवी की सुप्रसिद्ध रचना है। मै इसे वर्षों से पढता-पढाता रहा। सच कहू तो इसका सही और व्यापक अर्थ मेरी समझ में तब आया जब मैनें दीपशिखा के नाम पर एक गैस सेवा का नामपट्ट देखा। पहले तो अजीब लगा, किंतु सिलिण्डर पर शिखा का चिह्न देखकर कुछ राहत मिली। लगा कि एक साहित्यिक कृति का सदुपयोग हुआ है, दुरूपयोग नही। यह कहते  हुए हर्ष हो रहा है कि दीपशिखा गैस सेवा नें दीपशिखा की मूक और ठोस सेवा-भावना को मूर्त्त और सार्थक रूप प्रदान किया है। दीपशिखा गैस सेवा यानि दीपशिखा की तरह ठोस सेवा, सही सेवा, सबकी सेवा।

डॉ. जगदीश नारायण चौबे
पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष
साईंस कॉलेज,
पटना विश्वविधालय।

 

 दीपशिखा गैस सेवा अपने नाम के अनुरूप स्थापना काल से ही व्यवसाय मात्र न रहकर एक सामाजिक सेवा क पर्याय रहा है। वर्त्तमान आर्थिक युग में जहॉ अधिकांश संस्थाऍ धनोपार्जन की दौड में अपने सामाजिक कर्तव्य को भूल रही हैं, वहीं  दीपशिखा नें समय-समय पर पीडीत मानवता की सेवा एवं विभिन्न आवश्यकताओं पर दो कदम आगे बढकर अपने सामाजिक दायित्व का निर्वाह किया है, जो प्रेरणा का विषय है।

श्री सुशील कुमार मोदी
सदस्य: बिहार विधान सभा